Bas koshish karta hoon wo karne ki..
jiski kabhi koshish nahi ki...
Saans lene ki, Jeene ki
Kisi ko mahsoos karne ki
apne aas-paasUdne ki,
Aasmaan chune ki...
Be-rok-tok,, bindaas...
Koshishein hii to kaamyaab hoti hain... :))
Written by: Amit Ranjan, 20th Nov, 2006 [Comment by Poet: Bas likhe ja raha hoon.....bina jaane... bina samjhe. Likhna mera kaam hai, samjhna padhne walon ka:-) ]
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Friday, May 11, 2007
Tuesday, May 1, 2007
अमित की कविता
यह कविता मेरे दोस्त अमित ने लिखी है। तारीख २३ अप्रील २००७, वक़्त रात के १ बजकर १३ मिनट।
नींद कहॉ है क्या उसका पता है
कोई उसे बुला दो आवाज़ लगा दो
इन आंखों में अब नहीं वो रहती
उसका घर तो अब और कहीँ है
हो सके अगर तो उसको समझा दो
कोई चाहे उसको ये उसे बता दो
बहुत कम लिखा है उसने, लेकिन जब लिखा है तो निरुद्देश्य कभी नहीं लिखा।
नींद कहॉ है क्या उसका पता है
कोई उसे बुला दो आवाज़ लगा दो
इन आंखों में अब नहीं वो रहती
उसका घर तो अब और कहीँ है
हो सके अगर तो उसको समझा दो
कोई चाहे उसको ये उसे बता दो
बहुत कम लिखा है उसने, लेकिन जब लिखा है तो निरुद्देश्य कभी नहीं लिखा।
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